समान नागरिक संहिता पर छिड़ी हैं बहस,एक अकेला ऐसा राज्य जहां यूसीसी है लागू,आखिर क्यों छिड़ी है बहस,देखे जबरदस्त रिपोर्ट।

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यूनिफॉर्म सिविल कोड या यह कहे कि समान नागरिक संहिता जिसको अब आप यूसीसी के नाम से भी जान रहे हैं। यूसीसी में देश के सभी धर्मों, समुदायों के लिए एक सामान, एक बराबर कानून बनाने की वकालत की गई है। आसान भाषा में बताया जाए तो इस कानून का मतलब है कि देश में सभी धर्मों, समुदाओं के लिए कानून एक समान होगा।

*आखिर क्यों छिड़ी है यूनिफॉर्म सिविल कोड पर रार,जबकि भारत के एक राज्य में सौ सालों से लागू है यूसीसी,देखे जबरदस्त चर्चा सिर्फ के.डी न्यूज़ यूपी पर*

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यह संहिता संविधान के अनुच्छेद 44 के तहत आती है। इसमें कहा गया है कि राज्य पूरे भारत में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करेंगे।

यूसीसी पर चर्चित अवधी के कवि और शायर डॉ डीएम मिश्र ने अपनी राय रखी है,गौरतलब हो कि डॉ मिश्र की कई शेर टीवी चैनल के कार्यक्रमों में ऐंकर पढते रहते है।यूसीसी पर अपनी राय के साथ ही कविता व शेर के माध्यम से राय रखी है हम आप को उनकी एक एक शेर की कड़ी बीच बीच मे सुनाते रहेंगे।

यह मुद्दा एक सदी से भी ज्यादा समय से राजनीतिक नरेटिव और बहस के केंद्र बना हुआ है और भारतीय जनता पार्टी के लिए प्राथमिकता का एजेंडा रहा है। भाजपा 2014 में सरकार बनने से ही यूसीसी को संसद में कानून बनाने पर जोर दे रही है। 2024 चुनाव आने से पहले इस मुद्दे ने एक बार फिर जोर पकड़ लिया है।

भाजपा सत्ता में आने पर यूसीसी को लागू करने का वादा करने वाली पहली पार्टी थी और यह मुद्दा उसके 2019 के लोकसभा चुनाव घोषणापत्र का हिस्सा था।
यूसीसी का इतिहास 100 साल से भी ज्यादा पुराना है,आइये जानते हैं कि यूसीसी कब कब बात हुई।

यूसीसी का इतिहास 100 साल से भी ज्यादा पुराना है। यूसीसी का इतिहास 19वीं शताब्दी में खोजा जा सकता है जब शासकों ने अपराधों, सबूतों और अनुबंधों से संबंधित भारतीय कानून के संहिताकरण में एकरूपता की आवश्यकता पर बल दिया था।

हालांकि, तब विशेष रूप से सिफारिश की गई थी कि हिंदुओं और मुसलमानों के व्यक्तिगत कानूनों को इस तरह के कानून से बाहर रखा जाना चाहिए।

अंग्रेज क्योंकि एक ही श्वरवादी मतलब ईसाई थे, इसलिए उनके लिए भारत में चल रही जटिल प्रथाओं को समझना मुश्किल था। साथ ही अंग्रेजो का मुख्य उद्देश्य था भारत से पैसा लूटना, इसलिए वे किसी विवाद में नहीं पड़ना चाहते थे।

एक बार हम अपने दर्शकों को बता दें कि आजादी के बाद भी यूसीसी पर हुई थी चर्चा।

भारत की स्वतंत्रता के बाद यूसीसी पर अलग-अलग विचार थे। कुछ सदस्यों का मानना ​​था कि यूसीसी भारत जैसे अलग-अलग धर्मों और संप्रदायों वाले देश में लागू करना ठीक या बेहतर नहीं होगा, जबकि अन्य का मानना ​​था कि यूसीसी देश में अलग-अलग समुदायों के बीच एक देश-एक कानून की तर्ज पर सद्भावना लाएगा।

इस यूसीसी को लेकर बाबा साहब आंबेडकर और पंडित जवाहर लाल नेहरू की उस वक्त अलग-अलग राय थी,आइये जानते हैं।

डॉ. बी.आर. अम्बेडकर का इस मुद्दे पर मानना ​​था कि यूसीसी कोई थोपा हुआ नहीं बल्कि केवल एक प्रस्ताव था। वहीं, देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू का कहना था, “मुझे नहीं लगता कि वर्तमान समय में भारत में मेरे लिए इसे आगे बढ़ाने का प्रयास करने का समय आ गया है।”

इस बहुचर्चित यूसीसी पर सुप्रीम कोर्ट का क्या रुख हैं आइये अब हम आप को बताते हैं?

सुप्रीम कोर्ट ने कई ऐतिहासिक निर्णयों में सरकार से यूसीसी को लागू करने का आह्वान किया है और समय-समय पर न्यायालय ने केंद्र सरकार से इस पर अपना रुख स्पष्ट करने को कहा है।

मोहम्मद अहमद ख़ास बनाम शाह बानो बेगम के ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने एक तलाकशुदा मुस्लिम महिला की याचिका पर सुनवाई करते हुए याचिकाकर्ता के पक्ष में फैसला दिया और समुदाय के व्यक्तिगत कानूनों की बजाय भारत के कानून सीआरपीसी को प्राथमिकता दी थी।

इस फैसले में अदालत ने यह भी कहा था कि संविधान का यह अनुच्छेद 44 एक बेकार पड़ा हुआ आर्टिकल बनकर रह गया है।

आइये अब जानते हैं कि भारत में एक कौन सा राज्य हैं जहां यूसीसी लागू है, अव राज्य केवल सिर्फ गोवा है जहां यूसीसी लागू है।

हालांकि,भारत देश में एक शहर ऐसा भी है जहां आज या कल से नहीं बल्कि लगभग 150 साल पहले यूसीसी लाया गया था। वर्तमान में, गोवा भारत का एकमात्र राज्य है जहां समान नागरिक संहिता है।

इस संहिता की जड़ें 1867 के पुर्तगाली नागरिक संहिता में मिलती हैं, जिसे पुर्तगालियों द्वारा लागू किया गया था और बाद में इसे वर्ष 1966 में नए संस्करण के साथ बदल दिया। गोवा में सभी धर्मों के लोगों के लिए विवाह, तलाक, विरासत आदि के संबंध में समान कानून हैं।

पीएम मोदी ने हाल में यूसीसी की पुरजोर वकालत की।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने समान नागरिक संहिता की पुरजोर वकालत करते हुए विरोधियों से सवाल किया कि दोहरी व्यवस्था से देश कैसे चलेगा? उन्होंने साथ ही कहा कि संविधान में भी सभी नागरिकों के लिए समान अधिकार का उल्लेख है।पीएम मोदी ने हाल ही में एक चुनावी रैली के दौरान कहा था कि भाजपा ने तय किया है कि वह तुष्टिकरण और वोट बैंक की राजनीति के बजाय ‘संतुष्टिकरण’ के रास्ते पर चलेगी।उन्होंने कहा था विपक्ष समान नागरिक संहिता के मुद्दे का इस्तेमाल मुस्लिम समुदाय को गुमराह करने और भड़काने के लिए कर रहा है। प्रधानमंत्री ने कहा कि भारतीय मुसलमानों को यह समझना होगा कि कौन से राजनीतिक दल उन्हें भड़काकर उनका फायदा लेने के लिए उनको बरबाद कर रहे हैं।
प्रधानमंत्री ने कहा था, “हम देख रहे हैं समान नागरिक संहिता के नाम पर लोगों को भड़काने का काम हो रहा है। एक घर में परिवार के एक सदस्य के लिए एक कानून हो, दूसरे के लिए दूसरा, तो क्या वह परिवार चल पाएगा। फिर ऐसी दोहरी व्यवस्था से देश कैसे चल पाएगा? हमें याद रखना है कि भारत के संविधान में भी नागरिकों के समान अधिकार की बात कही गई है।”

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